नैनीताल की वादियों में गूंजती रहेगी आशा भोसले की आवाज़…प्राकृतिक सुंदरता में गीतों से लगाए चार चांद

नैनीताल। भारतीय पार्श्व गायन की कालजयी हस्ताक्षर एवं दादा साहब फ ाल्के पुरस्कार से सम्मानित आशा भोंसले का रविवार को 92 वर्ष की आयु में मुंबई में निधन हो गया। उनके निधन से देशभर में शोक की लहर है वहीं सरोवर नगरी नैनीताल के लिए भी यह एक भावनात्मक क्षति मानी जा रही है ऐसा इसलिए क्योंकि इस नगर की प्राकृतिक सुंदरता में चार चांद लगाने में उनके गीतों का दशकों पुराना गहरा संबंध रहा है। बता दें कि सात दशकों से अधिक लंबे कैरियर में आशा भोंसले ने 12 हजार से अधिक गीतों को अपनी आवाज दी और भारतीय संगीत को वैश्विक पहचान दिलाई है।
उनके अनेक लोकप्रिय गीत नैनीताल की नैनी झील तथा माल रोड और आसपास की पर्वतीय वादियों में फिल्माए गए जो आज भी पर्यटकों और स्थानीय निवासियों की स्मृतियों में जीवंत हैं। नैनीताल से जुड़े उनके कई सदाबहार गीतों में नैनीताल में 1958 में फिल्मायी गयी पहली फिल्म मधुमती के चढ़ गयो पापी बिछुआ… और घड़ी घड़ी मोरा दिल धडक़े… तथा गुमराह के एक थी लड़की मेरी सहेली… और तुझको मेरा प्यार पुकारे… शगुन का पर्वतों के पेड़ों पर शाम का अंधेरा है… वक्त फिल्म के दिन हैं बहार के तथा हम जब हो जाएंगे साठ साल के तथा भीगी रात का मोहबत से देखा खफा हो गए तथा सावन की घटा का जरा हौले हौले चलो मोरे साजना अनीता का करीब आ ये नजर तथा शिकार का पर्दे में रहने दो पर्दा न उठाओ और कटी पतंग का मेरा नाम है शबनम लोग मुझे प्यार से कहते हैं विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
इन गीतों ने नैनीताल को केवल एक फिल्मांकन स्थल नहीं बल्कि एक रूमानी अनुभूति के रूप में स्थापित किया। स्थानीय कला प्रेमियों के अनुसार आशा भोंसले को पहाड़ों की शांति और नैनीताल का वातावरण अत्यंत प्रिय था। इसलिये उनके सुरों ने यहां की वादियों में जो जादू बिखेरा, वह आज भी महसूस किया जा सकता है। आशा भोंसले का निधन भारतीय संगीत के स्वर्णिम युग का अवसान है, किन्तु उनकी मधुर आवाज नैनीताल की हवाओं, झील की लहरों और पहाड़ियों में सदैव गूंजती रहेगी।




