हल्द्वानी के राजपुरा की अनसुनी कहानी, कैसे बसी यह ऐतिहासिक बस्ती

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हल्द्वानी। शहर के विस्तार के साथ हल्द्वानी का पुराना स्वरूप भले ही बदल गया हो, लेकिन राजपुरा आज भी अपने भीतर शहर के बसने की कई कहानियां समेटे है। वरिष्ठ पत्रकार आनंद बल्लभ उप्रेती की पुस्तक ‘हल्द्वानीः स्मृतियों के झरोखे से’ में राजपुरा की बसावट और यहां रहने वाले पुराने परिवारों का उल्लेख मिलता है। राजपुरा कभी राजमिस्त्रियों की बस्ती, जंगल और बगीचों से घिरा इलाका था, जो आज घनी आबादी में तब्दील हो चुका है। यहां उस दौर के पुराने मकान और धोबीघाट आज भी निशानियों के रूप में हैं।

चलिये इतिहास के पन्ने पलटते हैं।

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राजपुरा क्षेत्र करीब 1940-41 में बसना शुरू हुआ। इससे पहले पहाड़ से आने वाले राजमिस्त्री सर्दियों में यहां अस्थायी रूप से काम करते थे। अंग्रेजी शासनकाल में पहाड़ के राजमिस्त्रियों को यहां बसाया गया, जिसके चलते मोहल्ले का नाम राजपुरा पड़ा। उस दौर में ईंट और सीमेंट का चलन कम था। पत्थरों को काटकर दीवारें बनाई जाती थीं और चूने का इस्तेमाल होता था। जगह-जगह भट्टियों में पत्थर पकाकर चूना तैयार किया जाता था। पुराने निर्माण की मजबूती आज भी कई जगह दिखाई देती है। सन् 1930 के आसपास उस समय राजपुरा का इलाका जंगल और रौखड़ था, जहां जंगली जानवरों का भी बसेरा था।

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अंग्रेज पहाड़ के लोगों को पत्थर की चिनाई और बढ़ईगीरी में दक्ष मानते थे। इसी कारण कई राजमिस्त्री परिवार यहां बसाए गए। राजपुरा का इतिहास धोबीघाट से भी जुड़ा है। अंग्रेजों ने बिजनौर से लोगों को बुलाकर यहां बसाया और कपड़े धोने के लिए धोबीघाट बनवाया। अंग्रेज अधिकारियों के कपड़ों की धुलाई और प्रेस के लिए यह व्यवस्था विकसित की गई थी। आनंद बल्लभ उप्रेती की पुस्तक में ऐसा उल्लेख मिलता है कि भारत-पाक विभाजन के समय पेशावर से आए कई परिवारों ने राजपुरा में शरण ली।

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