अल्मोड़ा के युवा वैज्ञानिक डॉ. रौतेला को कनाडा की प्रतिष्ठित CIRTA पोस्टडॉक्टोरल फेलोशिप

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यूनिवर्सिटी ऑफ वाटरलू में करेंगे वनाग्नि, वायु प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन पर शोध

अल्मोड़ा। जिले के युवा वैज्ञानिक डॉ. कुलदीप सिंह रौतेला का चयन कनाडा की प्रतिष्ठित कनाडा इम्पैक्ट रिसर्च ट्रेनिंग अवार्ड्स (सीआईआरटीए) पोस्टडॉक्टोरल शोधवृत्ति के लिए हुआ है। दो वर्षों की इस प्रतिष्ठित शोधवृत्ति के तहत डॉ. रौतेला कनाडा के विश्वप्रसिद्ध वाटरलू विश्वविद्यालय में पोस्टडॉक्टोरल शोधकर्ता के रूप में कार्य करेंगे। इस कार्यक्रम के लिए भारत से केवल चुनिंदा शोधकर्ताओं का ही चयन किया गया है, जिनमें डॉ. रौतेला भी शामिल हैं।

डॉ. रौतेला का शोध मुख्य रूप से वनाग्नि, वायुमंडलीय एरोसोल धाराएं, सूक्ष्म कण (पीएम 2.5) प्रदूषण तथा इसके मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों पर केंद्रित रहेगा। वायुमंडलीय एरोसोल धाराएं वायुमंडल में बनने वाली ऐसी लंबी और संकरी हवाई धाराएं होती हैं, जो धूल, धुएं और अन्य सूक्ष्म प्रदूषक कणों को हजारों किलोमीटर दूर तक पहुंचा सकती हैं। इनके कारण किसी क्षेत्र में अचानक वायु प्रदूषण बढ़ सकता है तथा जंगलों की आग से निकलने वाला धुआं दूर-दराज के इलाकों तक फैल सकता है।

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डॉ. रौतेला का यह शोध उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित होगा। हाल के वर्षों में राज्य में वनाग्नि की घटनाओं में वृद्धि हुई है। उनका अध्ययन यह समझने में मदद करेगा कि जंगलों की आग से निकलने वाला धुआं किस प्रकार लंबी दूरी तय कर वायु प्रदूषण बढ़ाता है तथा मानव स्वास्थ्य, हिमालयी पारिस्थितिकी और जलवायु को प्रभावित करता है। भविष्य में इस शोध के आधार पर वनाग्नि की निगरानी, वायु गुणवत्ता का पूर्वानुमान और आपदा प्रबंधन को अधिक प्रभावी बनाया जा सकेगा।

मूल रूप से हवालबाग विकासखंड के कयाला गांव निवासी‌ डॉ. कुलदीप सिंह रौतेला ने बीटीकेआईटी द्वाराहाट से बी.टेक., पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज चंडीगढ़ से एम.टेक. तथा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) इंदौर से पीएचडी पूरी की है।

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उन्होंने गोविंद बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान, जीबी पंत इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी तथा आईआईटी इंदौर में विभिन्न शोध परियोजनाओं पर कार्य किया है। उनका शोध जलवायु परिवर्तन, हिमालयी जल संसाधन, वायु प्रदूषण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मशीन लर्निंग तथा चरम जलवायु घटनाओं पर केंद्रित रहा है।

डॉ. रौतेला अब तक 44 अंतरराष्ट्रीय शोधपत्र, एक पुस्तक तथा दो पेटेंट के लेखक एवं सह-लेखक हैं। उनके शोध प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं और पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन तथा वायु प्रदूषण के क्षेत्र में उन्हें उभरते हुए भारतीय वैज्ञानिक के रूप में पहचान मिली है।

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