‘अमित शाह मुर्दाबाद’ के नारे पर शहर से निकाला….हाई कोर्ट की पुलिस को कड़ी फटकार

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बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक राजनीतिक कार्यकर्ता को मुंबई से एक साल के लिए बाहर (एक्सटर्न) करने के पुलिस आदेश को रद्द करते हुए कहा कि सरकार की आलोचना करना और उसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन करना नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है। अदालत ने मुंबई पुलिस की कार्रवाई पर सख्त नाराजगी जताते हुए कहा कि लोकतंत्र में असहमति और विरोध को अपराध नहीं माना जा सकता।

बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस माधव जामदार ने मुंबई पुलिस द्वारा सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के महासचिव सईद अहमद अब्दुल वहीद को 12 महीने के लिए मुंबई और उसके उपनगरों से बाहर करने के आदेश को रद्द कर दिया। सुनवाई के दौरान अदालत ने पुलिस की कार्रवाई पर तीखी टिप्पणियां कीं।

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जस्टिस जामदार ने कहा कि केवल सरकार की नीतियों का विरोध करने या ‘भाजपा सरकार मुर्दाबाद’ और ‘अमित शाह मुर्दाबाद’ जैसे नारे लगाने के आधार पर किसी नागरिक को शहर से बाहर नहीं किया जा सकता। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा, “नागरिक ऐसे नारे क्यों नहीं लगा सकते? ऐसे नारों के लिए शहर से निकालने का आदेश क्यों दिया गया?”

अदालत ने यह भी कहा कि विरोध और आंदोलन लोकतंत्र का अभिन्न हिस्सा हैं। जस्टिस जामदार ने टिप्पणी की कि पुलिस किसी राजनीतिक नेतृत्व की नहीं, बल्कि जनता की सेवक है। उन्होंने कहा कि यदि लोग सरकार की नीतियों या मुद्दों पर विरोध दर्ज कराते हैं तो इसे कानून-व्यवस्था के लिए खतरा मानना उचित नहीं है।

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याचिकाकर्ता सईद अहमद अब्दुल वहीद के खिलाफ वर्ष 2019 से 2024 के बीच पांच एफआईआर दर्ज की गई थीं। इनमें अधिकांश मामले केंद्र सरकार की नीतियों और विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों के खिलाफ हुए प्रदर्शनों से जुड़े थे। इनमें सीएए-एनआरसी, बाबरी मस्जिद विध्वंस, ज्ञानवापी मस्जिद विवाद, वक्फ बोर्ड में कथित भ्रष्टाचार और पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों के खिलाफ प्रदर्शन शामिल थे।

हाई कोर्ट ने कहा कि सरकार के फैसलों के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध या धरना-प्रदर्शन किसी व्यक्ति को शहर से बाहर करने का वैध आधार नहीं हो सकता। अदालत ने संविधान के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा के साथ जीवन जीने के अधिकार का हवाला देते हुए एक्सटर्नमेंट आदेश को निरस्त कर दिया।

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