आईवीएफ का खौफनाक सच-गुड़गांव के दंपति की गोद में आए ‘अजनबी’ बच्चे, डीएनए रिपोर्ट ने खोला राज

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नौ महीने की मन्नतें, डॉक्टरों के चक्कर और हर पल घुटती सांसों के बाद जब घर में जुड़वां बच्चों की किलकारी गूंजी तो गुड़गांव के उस आलीशान मकान की दीवारें खुशी से चहक उठी थीं। मां ने कांपते हाथों से अपनी ममता के टुकड़ों को सीने से लगाया और पिता की आंखों से आंसुओं का समंदर बह निकला। आईवीएफ का विज्ञान उनके जीवन में चमत्कार बनकर आया था।

लेकिन यह खुशी तब तक ही ठहरनी थी, जब तक बच्चों के चेहरे साफ नहीं हुए। जैसे-जैसे दिन बीते, दोनों बच्चों के चेहरे बदलने लगे। एक बच्चा माता-पिता जैसा दिख रहा था, लेकिन दूसरे बच्चे की आंखें और कशिश बिल्कुल ‘उत्तर-पूर्वी’ लोगों जैसी होने लगी। रिश्तेदारों की दबी जुबान में सुगबुगाहट, पड़ोसियों की तिरछी निगाहें और समाज के अनकहे सवालों ने मां-बाप के सीने में शक का ऐसा बीज बोया, जिसने रातों की नींद छीन ली।

आखिरकार, इस खामोश खौफ से पर्दा उठाने के लिए उन्होंने डीएनए टेस्ट कराने का कड़ा फैसला किया। जब रिपोर्ट लिफाफे से बाहर आई तो मानो पैरों के नीचे से जमीन ही खिसक गई। रिपोर्ट के ठंडे, बेजान अक्षरों ने चीख-चीखकर कहा कि वे बच्चे उनके आनुवंशिक (genetic) अंश हैं ही नहीं! विज्ञान के जिस वरदान को वे अपनी गोद में खिला रहे थे, वह दरअसल किसी अनजान क्लिनिक की अक्षम्य लापरवाही का एक भयानक सच था।

इस दिल दहला देनेवाली शुरुआत ने केवल एक परिवार को नहीं उजाड़ा, बल्कि फर्टिलिटी इंडस्ट्री की नैतिकता पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:
१. अस्पताल की नैतिक जिम्मेदारी और कानून
आईवीएफ जैसी संवेदनशील प्रक्रिया में स्पर्म या एग का ‘मिक्स-अप’ (अदला-बदली) होना केवल एक तकनीकी चूक नहीं, बल्कि एक आपराधिक लापरवाही है।
कड़े प्रोटोकॉल का अभाव: क्या क्लीनिकों में सैंपल्स की बारकोडिंग और पहचान की त्रिस्तरीय जांच सिर्फ कागजों पर होती है?
असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (ART) एक्ट: भारत के सख्त कानून के बावजूद जमीनी स्तर पर क्लिनिकों की जवाबदेही तय करना अब भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
२. मानवीय संवेदना और माता-पिता को आघात
यह त्रासदी किसी भी माता-पिता को गहरे मानसिक अवसाद और पहचान के संकट में धकेल देती है। नौ महीने तक जिस बच्चे को अपना मानकर कोख में पाला, उसे अचानक ‘अजनबी’ स्वीकार करना दिल को चीर देने जैसा है।
३. डीएनए मैच न होने पर बच्चों का भविष्य?
सबसे बड़ा और संवेदनशील सवाल उन बेकसूर बच्चों का है:
स्वीकार्यता का संकट: क्या यह समाज और वे माता-पिता उन बच्चों को पूरी तरह अपना पाएंगे?
कानूनी पेच: भविष्य में इन बच्चों की नागरिकता, उत्तराधिकार और असली जैविक (biological) माता-पिता की तलाश को लेकर एक कानूनी दलदल खड़ा हो जाता है।
४. मिलती-जुलती वैश्विक घटनाएं
कैलिफोर्निया (२०२१): एक दंपति को आईवीएफ मिक्स-अप के कारण अपनी जैविक बेटी को दूसरे परिवार को सौंपना पड़ा और उनकी बेटी को खुद अपनाना पड़ा।
नेदरलैंड्स (२०१६): एक लैब की गलती से २६ महिलाओं के अंडे गलत स्पर्म से फर्टिलाइज हो गए थे, जिसने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया था।
विज्ञान ने नि:संतान दंपतियों को माता-पिता बनने का सुख तो दिया है, लेकिन व्यावसायिक हो चुके इस क्षेत्र में जब तक ‘नैतिकता’ और ‘जवाबदेही’ को अनिवार्य नहीं किया जाएगा, तब तक ऐसी मानवीय त्रासदियां मासूम जिंदगियों और परिवारों को बिखेरती रहेंगी।

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