चुनावी साल में उच्च शिक्षा विभाग के तबादले बने विवाद का कारण, शिक्षकों और छात्रों में बढ़ी नाराजगी

ख़बर शेयर करें -

देहरादून, विशेष संवाददाता। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की आहट के बीच राज्य सरकार के भीतर बढ़ती खींचतान और गुटबाजी के आरोप अब प्रशासनिक निर्णयों में भी दिखाई देने लगे हैं। ताजा मामला उच्च शिक्षा विभाग में हुए बड़े पैमाने के तबादलों का है, जिसने शिक्षक समुदाय के साथ-साथ छात्र वर्ग में भी असंतोष पैदा कर दिया है।

जानकारी के अनुसार राज्य के विभिन्न राजकीय महाविद्यालयों में 70 प्रतिशत से अधिक शिक्षकों का स्थानांतरण कर दिया गया है। सबसे अधिक चर्चा कुमाऊं के प्रतिष्ठित एमबीपीजी कॉलेज, हल्द्वानी की है, जहां से अकेले लगभग 70 शिक्षकों का तबादला किए जाने की बात सामने आई है। यह निर्णय ऐसे समय में लिया गया है जब विश्वविद्यालय और सेमेस्टर परीक्षाएं जारी हैं।

छात्र संगठनों और महाविद्यालय से जुड़े लोगों का कहना है कि परीक्षा और मूल्यांकन कार्य के बीच इतनी बड़ी संख्या में शिक्षकों का स्थानांतरण शैक्षणिक व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। हल्द्वानी समेत कई स्थानों पर छात्रों में भी बेचौनी और नाराजगी देखी जा रही है।

यह भी पढ़ें 👉  देहरादून के पित्थूवाला में पॉलिटेक्निक शिक्षक से मारपीट के मामले ने तूल पकड़ा, शिक्षकों में रोष

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार के कुछ मंत्रियों और सत्ता के विभिन्न केंद्रों के बीच चल रही आंतरिक खींचतान का असर शासन-प्रशासन के निर्णयों पर पड़ रहा है। सत्ता गलियारों में यह चर्चा भी है कि कुछ नेता अपने ही सहयोगियों की राजनीतिक जमीन कमजोर करने और संगठनात्मक प्रभाव कम करने की कोशिश में लगे हैं। एक-दूसरे की जड़ें काटने, आंतरिक गुटबाजी और वर्चस्व की लड़ाई ने पार्टी के भीतर असहज माहौल पैदा कर दिया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि चुनाव से ठीक पहले उच्च शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में लिया गया यह निर्णय सरकार के लिए राजनीतिक रूप से महंगा साबित हो सकता है। शिक्षक समुदाय समाज का एक प्रभावशाली वर्ग माना जाता है, जिसकी सीधी पहुंच युवाओं और अभिभावकों तक होती है। ऐसे में यदि शिक्षकों और छात्रों दोनों में असंतोष बढ़ता है तो इसका असर जनमत पर भी पड़ सकता है।

विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे को हाथोंहाथ लेते हुए सरकार पर शैक्षणिक संस्थानों की स्थिरता से खिलवाड़ करने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि प्रशासनिक जरूरतों के नाम पर ऐसे फैसले लिए जा रहे हैं जिनसे शिक्षा व्यवस्था और विद्यार्थियों के हित प्रभावित हो रहे हैं।

यह भी पढ़ें 👉  मतदाताओं के लिए बड़ी पहल: 7 जुलाई तक घर-घर पहुंचेंगे बीएलओ, भरवाएंगे गणना फॉर्म

हालांकि सरकार और विभागीय अधिकारियों का कहना है कि तबादले पूरी तरह प्रशासनिक प्रक्रिया और नीति के अनुरूप किए गए हैं तथा इससे संस्थानों में संसाधनों का संतुलित वितरण सुनिश्चित होगा। लेकिन सवाल यह है कि जब परीक्षाएं चल रही थीं तब इतनी व्यापक कार्रवाई की आवश्यकता क्यों महसूस हुई।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि सरकार समय रहते शिक्षक समुदाय और छात्रों की चिंताओं का समाधान नहीं करती, तो चुनावी वर्ष में यह मुद्दा केवल प्रशासनिक निर्णय तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सरकार की लोकप्रियता और जनस्वीकृति पर भी असर डाल सकता है। पार्टी के भीतर जारी गुटीय संघर्ष और नेतृत्व के विभिन्न केंद्रों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा पहले ही चर्चा का विषय बनी हुई है। ऐसे में उच्च शिक्षा विभाग का यह विवाद सरकार के लिए एक नई चुनौती बनकर उभर रहा है।

ADVERTISEMENTS Ad Ad
Ad